रामायण त्याग, मर्यादा और कर्तव्य पालन की अमर गाथा है: भरत उपाध्याय
श्रीराम कथा के छठवें दिवस राज्याभिषेक की घोषणा से लेकर वनवास प्रसंग तक का मार्मिक वर्णन, श्रद्धालुओं की आंखें हुईं नम

आगरा। गणेश दुर्गा महोत्सव कमेटी के तत्वावधान में लंगड़े की चौकी, शास्त्री नगर में चल रही 10 दिवसीय श्रीराम कथा के छठवें दिवस पर भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा, कोप भवन में दशरथ-कैकई संवाद और श्रीराम के वनवास के अत्यंत करुण प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा व्यास भरत उपाध्याय के मार्मिक वर्णन से कथा स्थल पर उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालु भावुक हो उठे और अनेक लोगों की आंखें सजल हो गईं।
कथा के छठवें दिवस सोमवार को कथा व्यास भरत उपाध्याय ने भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की घोषणा के प्रसंग से कथा का आरंभ किया। उन्होंने बताया कि जब अयोध्या में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, तब पूरा नगर उत्सव और हर्षोल्लास के वातावरण में डूबा हुआ था।
इसके पश्चात उन्होंने कोप भवन में राजा दशरथ और कैकई के संवाद का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया। कथा व्यास ने बताया कि कैकई ने पूर्व में दिए गए दो वरदानों की याद दिलाते हुए भरत को अयोध्या का राज्य और श्रीराम को 14 वर्ष के वनवास का वरदान मांग लिया। यह सुनकर राजा दशरथ अत्यंत व्यथित हो गए और पुत्र वियोग के दुख में उनका हृदय व्याकुल हो उठा।
कथा व्यास ने कहा कि यह प्रसंग हमें जीवन का महत्वपूर्ण संदेश देता है कि निंदा और चुगली करने वालों से सदैव दूर रहना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग परिवार और समाज में भ्रम और कलह पैदा कर देते हैं। उन्होंने कहा कि मंथरा की कुटिल बातों ने कैकई की बुद्धि को भ्रमित कर दिया, जिसके कारण अयोध्या जैसे सुखी राज्य में भी दुख और संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई।
उन्होंने राजा दशरथ के प्रसंग को समझाते हुए कहा कि जब समय अनुकूल नहीं होता, तब सिंह भी गीदड़ से हार जाता है। उसी प्रकार महान और पराक्रमी राजा दशरथ भी परिस्थिति और समय के कारण कैकई के सामने असहाय हो गए। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में समय और परिस्थितियों का महत्व कितना बड़ा होता है।
कथा व्यास भरत उपाध्याय ने जब राजा दशरथ के करुण विलाप और श्रीराम के वनवास स्वीकार करने के प्रसंग का वर्णन किया, तो कथा स्थल पर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो गए और अनेक लोगों की आंखें नम हो गईं।
उन्होंने कहा कि रामायण त्याग, कर्तव्य और मर्यादा की अमर कहानी है। भगवान श्रीराम ने पिता के वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए राजसुख और वैभव का त्याग कर वनवास स्वीकार किया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जीवन में कर्तव्य और वचन की मर्यादा सबसे बड़ा धर्म है।
कथा के दौरान कथा व्यास ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए भजन “राम को जप ले, राम को पा ले, राम आएंगे तेरे काम” प्रस्तुत किया। इस भजन पर श्रद्धालु भक्ति भाव में झूम उठे और पूरा कथा पंडाल राम नाम के संकीर्तन से गूंज उठा।
इस अवसर पर लंगड़े की चौकी स्थित श्री हनुमंत धाम मंदिर के महंत गोपी गुरु जी ने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन त्याग, अनुशासन और कर्तव्य पालन का सर्वोच्च उदाहरण है। उन्होंने कहा कि श्रीराम ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि परिवार और समाज की मर्यादा को बनाए रखना ही सच्चा धर्म है। यदि समाज राम के आदर्शों को अपनाए, तो जीवन में शांति, प्रेम और सद्भाव की स्थापना हो सकती है।
कथा विश्राम के पश्चात श्री राम चरित मानस जी की आरती अभिषेक महाराज, चमड़ा एवं फुटवियर उद्योग परिषद के अध्यक्ष पूरन डावर, नेशनल चैंबर के उपाध्यक्ष नितेश अग्रवाल, श्याम भदौरिया, नितिन कोहली तथा डीजीसी क्राइम राधा कृष्ण गुप्ता ने उतारी।
इस अवसर पर पुष्कल गुप्ता, लालू जादौन, राजदीप ग्रोवर, पार्षद पूजा बंसल, कंचन बंसल, अनुज शर्मा, गिरिराज बंसल, डॉ. हरेंद्र गुप्ता, डॉ. एस.पी. सिंह, योगेश रखवानी, डॉ. दीपेश उपाध्याय, राघव उपाध्याय आदि उपस्थित रहे।


